कुछ पुरानी किताबें नई किताबों के नीचे थीमैंने उनको देखा, समझा, उठाया, गले लगाया,पर वो शायद मुझसे अपनी आँखें मीचे थी।
खुशबू हर एक वर्क में शायद तेरे जैसी थी
हर एक शब्द, संजोया था जो तेरी यादों में
उन सब शब्द के माने कितने सुलझे थे
और तुम कहीं दूर ख्याल में उलझे थे
हर एक आखर लिखा हुआ तेरे वादों में
जैसी तेरी सूरत, शब्दों में बिल्कुल वैसी थी।
वो काली रेखा उन पर अब उभर आई थी
जो तुम अपने रिश्तों के बीच में खींचे थी।
उन पर चढ़ी हुई धूल मुझसे बात ये करती है
कितने दूर निकल आये है, अब हम दोनों
शायद वो ही बचपन था, पर नादान दिल
आज भी रोता रातों को, तेरी उन बातों में
जो कभी कही कभी रही बिन कही हमारे में
पर ये जो बातें हैं जो आज भी बीच हमारे में
दिन में छुप जाती पर सुलगती हैं रातों में
जब मेरे हर स्वप्न में हम दोनों लेते हैं मिल
छलिये स्वप्न में सही, एक तो हैं हम दोनों
इच्छा तुमसे मिलने की, हर रोज ही मरती है,
तुम खुश हो तो माली दिल भी मेरा खुश है
हरी भरी वो फुलवारी है जो उसने सींची थी।