रात भर संग में मेरे, चाँद भी सिसकता रहा मुझमें तू जीती रही, रात भर मैं मरता रहा । सारे अधूरे ख्वाब जो भी, पूरे हो ना पाए हैं, सारी बातें जो बनी, हिस्सा इस कहानी का सारे मन के गीत जो, मन ही मन में गाये हैं सारे मोती हिस्सा हैं, आँख के इस पानी का उन मोतियों से रात भर गागर कोई प्यार की हर बार डूबी, मैं मगर हर बार हूँ भरता रहा, मुझमें तू जीती रही, रात भर मैं मरता रहा। तुम रही थी पुष्प, भगवान की दहलीज के मैं सरोवर बेकार कमलों को अखरता रहा मैं बना था पेड़ उन भावनाओं के बीज के जिससे हर बार, तेरा यौवन निखरता रहा हर बार मिलन की शक्ति मुझमें, तुम अहो फूँकती रही हो, मगर हर बार मैं डरता रहा मुझमें तू जीती रही, रात भर मैं मरता रहा ।