कभी याद की
परतें खोल के महक गए
कभी कुछ ख्याल बुन के
यूँ ही चहक गए
कभी ऐसा खुमार चढ़ा
तन्हा सफ़र भी कारवाँ लगा
कभी ऐसी बेखुदी छाई
भीड़ में भी तन्हा हो गए
कभी मन के शिवालय में
उम्मीद का दीप जला तो, जी लिए
कभी मन मे घना तिमिर छाया तो
मर गए
कभी ज़िन्दगी का ख्याल कर
बाँध से भर गए
कभी किसी से इजहार कर
बून्द बून्द झर गए
कभी रुआंसा होकर उसे पुकार लिया
कभी गीत में ढाल लिया
कभी खमोशी से गुनगुना लिया
कभी शोर करके छुपा लिया
हम ताउम्र इसी में मशरूफ़ रहे
कभी जी लिए, कभी मर लिए
कितने जिए, कितने मरे,
इसी उधेड़-बन में हार गए
अब क्या शिकवा करें हम
क्यों किसी से गिला करें हम
हम-से कितने ही तो
यूँ ही जीस्त गुजार गए,
सब पार गए, सब पार गए
~ रोहित कुमार
Twitter = @YesIRohit


