मैरे पापा,
घर से दूर घर वालों के लिए बैठे,
सब की याद, चुप ह्रदय में समेटे,
थक कर भी थकते नही है कभी,
सब की ख्वाहिशें हैं जेहन में समेटे,
सब से वे सदां हँस कर मिलते हैं,
अपनी वे किसी से भी न कहते हैं,
अपनी कभी न कोई ख़्वाहिश रखते,
सबकी ख्वाइशें पूरी करने में लगें रहते हैं
त्योंहार तो हम हर साल ही मनाते हैं,
वे दो-तीन साल में घर एक बार आते है,
बाहर से कठोर अंदर से नरम ह्रदय उनका,
पापा, जिनसे हम सदां डरते-घबराते हैं,
हर हाल में ख्वाहिशें पूरी करते हैं हमारी,
क्या हम उनकी ख्वाइशें पूरी कर पाते हैं,?
-रोहित
