#विश्वगोरैयादिवस #कविता
पहले, बहुत पहले
तुम घर-आंगन चहकाती थी
कभी बरामदे, कभी आंगन, रोशनदान
या खेजड़ी की शाखाओं पर से
संग साथी शोर मचाती,
घर आंगन चहकाती थी!
कभी रोटी का टुकड़ा चुगने
निकट थाली के आ जाती
एक टुकड़ा मुह में दबा
फुर्र से उड़ जाती
फिर आती थी, फिर उड़ जाती थी
दादाजी देख तुमको कहते
बरखा होगी,
जब तुम मिट्टी में नहाती थी
कितनी सहज, सयानी थी
ऋतुओं का परिवर्तन बतलाती,
मौसम की अंगड़ाई महसूस कराती थी
पहले, बहुत पहले
तुम जीवन चहकाती थी
मैं अब-भी खाना खाने से पहले
तुम्हारे लिए रोटी के टुकड़े रखता हूँ
मैं अब भी उस मिट्टी के कुण्डाल में
रोज पानी भरता हूँ
और बैठ कर कई-कई देर तक
तुम्हारी राह तकता हूँ
पर अब जो तुम नही आती
मैं ही हूँ इसका अपराधी
हमने प्रगति की अंधी दौड़ में
तुम्हारे प्राण लिए!
और तुम्हारी मृत्यु से ही
प्रगति के सूचकांक जान लिए!
इसलिए ओ-गोरैया
अब तुम न आना
कहीं दूर जंगल में ही रहना
जंगल ही चहकाना,
जैसे पहले, बहुत पहले
इस हत्यारे मानव के पुरखों का
घर आंगन चहकाती थी
-रोहित
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