दो सेनाओं ने आपस में,
भीषण रण का ऐलान किया,
काटेंगे या कट जाएंगे,
कठोर विभत्स संकल्प लिया।
नंगी तलवारें, बरछी-भाले,
लिए एक से एक शस्त्र,
कटने को आमादा थे,
दृढ़ निश्चय कर पहन वस्त्र।।
भय-चिंता को दूर फेंक,
टूट पड़े एक-दूजे पर,
जैसे शिकार पर टूटता है,
भूखा गर्जन करता नाहर।
रणभूमि पट रही लाशों से,
हर ओर मची है काट मार,
सेनापति चिल्लाते हैं,
बढ़ा और तू तेज धार।।
हे वीर पुरुष आगे बढ़कर,
दुश्मन का सीना चीरो,
मस्तक को कर दो चूर-चूर,
उनके तन का लोहू पी लो।
आगे ही बढ़ते जाओ,
जय माँ भवानी बोलकर,
दुश्मन भी थर्रा जाए,
करके उग्र ननाद श्रवण।।
बस एक कर्म है यहां सभी का,
युद्धरत ही रहना है,
परिजन, स्वजन का विषय छोड़,
पथ पर आगे ही बढ़ना है।
अच्छा सबको स्मरण रहे,
यह तो है रणभूमि।
करना है बस युद्ध यहां,
अपने शस्त्रों को चूम।।
-यमुना धर त्रिपाठी

