माँ का है दरबार निराला,
सबका साथी व रखवाला।
भाव-भक्ति से जो कोई ध्यावे,
दुःख कटे, सुख संपत्ति पावे।।
माँ का पावन दरबार सजा है,
भाव भक्ति से भक्त खड़ा है।
माँ का है श्रृंगार निराला,
प्रदीप्त हो रही अग्निज्वाला।।
माथे चुनरी चमक रही है,
माँ की चूड़ी खनक रही है।
ढोल-नगाड़े खूब बज रहे,
माँ की बिंदिया दमक रही है।।
सबकी कामना पूरा करती,
भक्तों की माँ विपदा हरती।
पूरन करती है अभिलाषा,
साहस मिले, हो दूर निराशा।।
आओ माँ के दरबार में,
मिलकर उन्हें मनाएं।
विपदा को हर लेने वाली,
माँ की स्तुति गाएं।।
-यमुना धर त्रिपाठी


