द्विविधा रहती जीवन भर,

प्रतिदिन, प्रतिपल और अक्सर,

आज यहां, कल कहाँ रहेंगे?

आगे बढ़ेंगे या गिर पड़ेंगे,

प्रतिदिन खींच तान मची है,

प्यादों से रणभूमि सजी है,

दो मुंह वाले इंसान बहुत हैं,

आगे-पीछे और सन्मुख हैं,

खुद से खुद की है लड़ाई,

बदल रही अपनी परछाई,

चिंता की रेखा ललाट पर, 

द्विविधा रहती जीवन भर..!


कौन है अपना? कौन पराया?

किस-किस में है द्वेष समाया?

कौन सही है? कौन आवारा?

कौन घृणास्पद, कौन दुलारा?

ऐसे विचार हैं खूब समाए,

मन चिंतित हो खूब सताए,

अगले दिन कब-क्या हो जाए?

कौन जानता हम मर जाए?

कौन निराश्रय? कौन सहारा?

कौन दूजा है? कौन हमारा?

चिन्ता सता रही अक्सर,

द्विविधा रहती जीवन भर...!


-यमुना धर त्रिपाठी