बात बहुत पहले की है,

चंहु ओर आनंद बरसता था।

कहीं किसी निर्जन वन में भी-

मानव प्रेम न थकता था।।

अपनापन सा दिखता था,

गली, मोहल्ले, नगर, गांव में।

हर ओर दिखाई देता था

शहर, वीथिका और छांव में।।

दादा, दादी, चाचा चाची

परिवार संग में रहता था।

भाई मिलजुल कर रहते थे

घर-घर में स्नेह बरसता था।।

सुख-दुख की बातें होती थी,

साथ बैठकर खाते थे।

एक दूसरे की सेवा करके,

मन ही मन अधिक सुहाते थे।।

एक साथ में, एक बार में,

पूरा काम वे करते थे।

आपस के मदद कार्य से,

कभी नहीं वे थकते थे।।

जाने वह समय और वह दिन,

कहाँ? किधर? और कब गया?

अपने परिजन से मिलने को,

छोटा बच्चा तरस गया।।

अधुनातन के चकाचौंध से,

गांव-गांव निर्जन हो आए।

मानव अपने अब परिजन से,

जब मन चाहे मिल ना पाए।।

भाव, विचार और चाल-चलन,

सबने खुद को बदला है।

बात पुरानी है यह कि-

सर्वत्र प्रेम भी फैला है।।


-यमुना धर त्रिपाठी