गहन संवाद हैं,
यथार्थ का भाव हैं,
असमंजस में भी सरलता स्वीकार्य हैं,
कहो अद्भुत ये वार्तालाप हैं,
घनिष्ठ होते रिश्तों से भरते सारे घाव हैं,
मनमानी की हार हैं,
सम्मान की पूंजी से तो रिश्तों की नैय्या पार हैं,
गहन संवाद हैं,
ज़िक्र में आराम हैं,
सारी गुफ्तगू अब सरेआम हैं,
चांदनी जो बिखरी हैं,
अनोखी बड़ी ये रात हैं,
थोड़ा मखमली एहसास हैं,
रूह को रिहा करता ऐसा अपना यथार्थ हैं।
- यति
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