वक़्त कम हैं?
ज़्यादा उसमें तुम्हें लगती गिरफ्त हैं?
कायदे की बात करें?
या मर्यादा को लांघ चले?
परिवार यकीन कर स्तब्ध हैं!
उमड़ा ज़िम्मेदारियों का सैलाब हैं,
सुनो ज़रा,
वक़्त को वक़्त दो...
उम्र पार नहीं हुई!
फ़िक्र सब सिधार रहीं?
जन्म़ो का साथी मिला तुम्हें?
कदमों का मंज़िल से फासला कम हैं?
आवाज़ में उसकी ठहराव हैं?
तुम्हारे संतुलन में नेक बदलाव हैं?
गहरे घावों का अनेक तुम्हें एहसास हैं?
कोशिश में उसकी विश्वास हैं?
रखकर आस बुझ रही तुम्हारी प्यास हैं?
बाकायदा प्रक्रिया के पालन में सफलता निहित हैं,
ज़िन्दगी तुम्हें संवार रहीं...
वक़्त को ज़रा वक़्त दो।
- यति


