विकसित विश्वास तभी जब ना जमें वहम की धूल,

अलहदा व्यक्ति बांधता कई दफा बातों के पुल!

कुछ दिनों में तुम्हारे समक्ष जाएंगे सारे राज़ खुल,

क्या लिया तुमने सच्चाई को फिर सहसा कुबूल?

भुलाई अपनों से हुई जो छोटी भूल?

अब वहम भी होता जाएगा ये विलुप्त ,

रिश्ते अपनों संग होते सब्र से पुनः दुरुस्त ,

खामोशी में उलझन ना बिसरे ,

वक़्त की परीक्षा में पांव ना तुम्हारे फिसले ,

रास्ता न हो आशंका से विचलित,

ना रहे मन ज़रा भी पीड़ित,

कुंठा से मुक्ति में प्रत्येक का हित,

मुस्कान से तुम्हारा चेहरा हो जाएं फिर ललित।



- यति