उल्फत में ना रह हमनशीं,
कुदरत में उपलब्ध हैं राज़,
सारे तेरे सपनों के सफर के हसीन,
ये खुला आकाश, गुनगुनी धूप,
तेरे तन का ये उजला स्वरूप,
अस्थाई स्पंदन से करके खुदको मुक्त,
हो जा चैतन्य की शक्ति से युक्त,
सितारों संग तू कर थोड़ी मन की बात,
सघोष हृदय को सुलभ सा दे विराम,
आत्मा जानती सही समय का कब करना निर्माण।
- यति

