तुम्हारे जैसा कोई और कैसे होगा?
वक़्त ने शायद कोई बेहतरीन फेर रचा होगा,
तनिक सी बात पर भेद करा होगा,
हां, शायद तुम्हें सैकड़ों में एक रखा होगा,
तभी देखो ना गम में भी मुस्कुराती हो,
संपूर्णता का एहसास दिलाती हो,
थोड़ा अकेले में सहम जाती हो,
कहो दिन में कितनी दफा ज्ञान से मन बहलाती हो?
खुद में इतना बड़प्पन हैं,
थोड़ा सा अलहदा लड़कपन हैं,
कोई तो करिश्मा तुम में हैं,
वो फरिश्ता तुम में हैं,
गलती जो खुदकी मानती हो,
खुदकी भी थोड़ी हंसी उड़ाती हो,
ज़रा कभी थोड़ा पिनक जाती हो,
शांति का दूत बन फिर मग्न हो जाती हो,
क्या होगा कोई तुमसा?
जो बनाता हो हर क्षण का त्यौहार,
लाता हो सुमन उपहार,
ख़ुशी से झूम उठती तुम जैसे बहार,
परिवर्तनशील हैं तुम्हारा व्यवहार,
जैसे घुमाना सीख रही नौका की पतवार,
जीवन का यही तो असल सार,
व्यक्त करती तुम अपनों को आभार,
तुम्हारी प्रतिभा भी आपार,
गोल सा मुखड़ा, आंखों में सपने लिए हुई हज़ार,
हर त्रुटि में सुधार के बिंदु चंद,
नहीं ज़रा भी द्वंद,
हर सीख से मिले आनंद,
राय प्रगतिशील , विचार होते स्वच्छंद,
तुम्हारे जैसा कोई और कैसे होगा?
वक़्त ने शायद कोई बेहतरीन फेर रचा होगा।
- यति


