तुम्हारी तारीफ़ में कोई जुमला ?

कहो किससे कहूं सखी तुम्हारा असल रंग जो झलका,

जानती तुम ! इस बार तो दिल भी हुआ हल्का,

मत रखना ज़हन में तुम भी कोई बोझ कल का,


हां! किस्मत बड़ी निराली हर विपत्ति का हल निकला,

जानती तुम , वो थकता नहीं जो सफर में अकेला,

लोग जो देते स्मृति का हवाला!

उनके भीतर नहीं प्रलोभन का छलावा!


सपनों के ज़िक्र से तुम्हारा मुख चहका,

रंग फिज़ाओं में भी उम्मीद का महका,

कैसे भूलूं त्याग तुम्हारा गहरा?

नम आंखों में रहता आज कल तुम्हारी ख़ामोशी का पहरा।


- यति