तुम्हारा ज़िक्र ना करें कैसे?

अभिव्यक्त वो फिक्र करें ना कैसे?

देखो प्रेम में सशक्त स्त्री हुई मैं ऐसे!

बचपन की प्रेरणा मिली बिना मंज़िल से आसक्त हुए जैसे!


अब क्या फरमाएं?

जो शब्द हैं उन्हें क्या लिफ़ाफे में दफनाएं?

या तुमको गुनगुनाते हुए सब कुछ सुनाएं?

रुको अभी हृदय को थोड़ा लेने दो शरमाएं!


प्रस्तुत हैं :-


तहज़ीब

गुम न हुआ तुम्हारा रूहानी एहसास तो वैसे,

सब्र का मिला उपहार हो हर सांस को जैसे,

तेज़ वायु जो चलती हैं,

जीवन की जटिलताओं से समझ की आयु भी तो बढ़ती हैं,

बेचैनी वाली तकलीफ़ मानो उम्र बढ़ने संग घटती हैं,

तहज़ीब से तुम्हारी आई बाबा की सफलता झलकती हैं,

प्रेम में बचपने की उम्र भी तो सही से संवरती हैं,

ललक मेरी अब मेरी नादानी को भी जायज़ समझती हैं,

कोई शाम फिर जब सुकून में ढ़लती हैं,

मेरे नैनों के समक्ष हंसी तुम्हारी देखो कैसे टहलती हैं!

आंगन में नमी हैं,

पौधों की माटी से सौंधी सुगंध बंधी हैं,

बरसात की मौसम में चाहे फिलहाल कमी हैं,

लेकिन तुम्हारे होने का आभास लिए ही तो धूप झरोखें से छनी हैं,

तबीयत तुम्हारी अब जो सही हैं,

लगता इबादत को मरहम की दुआ कबूल हुई हैं,

शख़्सियत को तुम्हारे उपस्थित होने की दौलत मिली हैं,

मसरूफ़ हुए हम रूह हमारी शाश्वत प्रेम में खिली हैं।


- यति