स्वरचित इतिहास वो जहां कल्पना से हो रहा हो उद्गम,

स्वाभिमानी स्वतंत्र सोच की अभिलाषा का सरगम।


उदयमान होता हमारे ममता का उत्पल,

खिलें ख्वाबों के समीप हमारे मंज़िल के अफसाने।


जहां तरकीब से निकल जाए मुश्किल समय के ज़माने,

वहां कभी नहीं खड़े होते तारीफ के पुल बनाने वाले।


स्वरचित कला वही जो स्वत: ही मेहके,

नहीं दिखे वहां कभी सीने खौफ से देहके।


सोच सोच से ना मिले, मंज़ूर है जनाब,

कला बेमन से हो तो बड़ी बेमानी है।


स्वरचित इतिहास वो जहां कल्पना से हो रहा हो उद्गम,

स्वाभिमानी स्वतंत्र सोच की अभिलाषा का सरगम।


- यति