क्यूंकि सुबह की पहर एक नया उजाला जो लाती है...

तनाव के घने काले बादलों को खुद-ब-खुद हवा अपने संग कहीं दूर ले जाती है

शंका के उस कोहरे में ,

सर्द हवा जैसे उस अकेलेपन में,

खुदको कभी हताश ना होने दिया,

क्यूं ?

क्यूंकि सुबह की पहर एक नया उजाला जो लाती है...

पतझड़ जैसा हमारा भी रुख हो चला हैं,

सूखे पत्तो जैसे अपनों को हवा के संग लुप्त होने से हम नहीं रोकते,

गुज़रे अतीत को बेवजह नहीं निहारते,

बस हर नुस्खे से परिस्थिति को संवारते।


क्यूंकि सुबह की पहर एक नया उजाला जो लाती है...

गुनगुनी सी धूप फिर फिज़ाओं को महका देती,

गुलशन खिलते फिर उम्मीदों के,

जमघट लगते प्रकृति के दीवानों के,

हम आने देते संग नई बहारो के तराने।


क्यूंकि सुबह की पहर एक नया उजाला जो लाती है...

फिर मौसम भी बदलेंगे,

क्या पता हम कहीं फिर से बिछड़ेंगे,

लेकिन रात की रानी बनकर फिर सुगंध लिए यूंही चले आना,

हाल चाल पूछ कहीं समय के साथ सौंधी सी मिट्टी में मिल जाना,

तन्हा दिलों में आशा का बीज 

बनकर ,

फिर हरियाली लेते चले आना।


~ यति

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