सिमटे हुए हो ?

ज़रा थोड़ा बिखरे हुए हो ?

कहीं तलाश हैं खुदकी ?

या बेखयाली में हो रही हैं वक़्त की बर्बादी?

तनी हुई तुम्हारी छाती!

करना नहीं चाहते अपने हुनर से गद्दारी?

फिर स्रोत को पहचाने क्या?

ज़रा पीछे बचपन के दिनों को खंगाले क्या ?

कुछ पाया तुमने ?

वक़्त बेवक्त हंसते थे ,

दिल किया तो रोते थे?

ज़रा सी बात पर उत्सुक,

बड़ी बात पर भी गुपचुप,

हर हालात में तुम छुप छुप,

तकते थे अपनों को,

जानते नहीं थे सबके नाम,

रिश्तों में नहीं सीखा तुमने निकालना काम!

ज़रा अबोध हो?

मन से सुबोध हो?

विचलित होकर भी स्थिर हो?

सहस्त्रार से समस्त शक्ति को सुचारू रखो,

बिना किसी कारणवश भी प्रेम से ओत प्रोत रहो।✨


- यति