स्मृति की कीर्ति!

कैसे रचित होगी किन्तु...

नवीन निर्मलता की पूंजी?

ख़्वाबों की खिड़की से सारी बातें गूंजी,

विस्मित हुए जो उन्होंने भी तो जान अपनी फूंकी,

कम से कम त्रास नहीं ऐतराज़ का,

क्या वो जानें हैं असल मेरे एहसास का?

स्मृति की कीर्ति!

स्वागत सुनहरा अब भव्य!

काव्य में छुपे जो दुर्लभ सत्य,

विवेक की तो उम्र सदियों पुरानी,

परवरिश में ही लेखन से हुई हमें जो यारी,

अब तकलीफ का क्या बताएं,

विमर्श कर हुए हम फिर से खाली,

साहित्य की मशाल से युक्त चिंगारी,

अंतर्मन से हम हैं हर लेखक के आभारी।




- यति