समझा स्वधर्म संग तत्व,
रंगों के सरोवर में पाया जज़्बातों का सत्व,
घटता बढ़ता रहता चुनौतियों का अस्तित्व,
किन्तु वो नहीं दर्शाती हमारा असल व्यक्तित्व,
विचार प्रेम को लेकर आया इक अनोखा!
लिखना हैं वो जिससे अभिव्यक्त हो मन का लेखा जोखा,
पवित्र रिश्तों के तप में जो भी था अकेला,
वो उतावला हैं देखने को कला का अतरंगी मेला,
जानने में प्रतीत हो भले थोड़ी देरी,
निर्मित होने दो राहत की चूनर चंदेरी,
कल थी निशा कुछ घनेरी,
आज फिर उजाले ने संभावना नई उकेरी,
एक ठहाका मानो लेना हो दुल्हन को नवेली!
तो संग व्यतीत कर वक़्त, सुलझाओ अदृश्य पहेली,
पहले बनो खुद अपनी सहेली,
राज करेंगी खुशियां फिर तुम्हारी हवेली।
- यति


