सीमित शब्दों की कतार,
हर जज़्बात में अदृश्य विस्तार,
अछूता न रहता कोई भी देश दरबार,
गिरते उठते ना मानी जैसे तुमने कभी हार,
लेखन की शैली की जब भी बात,
हो जाना सजग, विचारों संग थमना इक रात!
किफायत ना देगा ये दर्द माना बेहिसाब,
बार बार न तको वही रूठी व्यथा नहीं लाजवाब!
थोड़ा सब्र रखो,
थोड़ा हंस पड़ो,
अश्रुओं को ना बहाओ कतलेे आम,
स्वाभिमान स्वत: समझे न करो रिश्ता जाम,
हर मेज़बन नहीं किन्तु यकीन करने योग्य वफादार,
परन्तु ज़िन्दगी में जुड़ता हर किस्सा मज़ेदार।
- यति


