जीवन में एकांत का सुराग हो लगाना!

तो साहित्य की कुछ पहेलियां बुझाना!

झांकना फिर दिल के उस करिश्माई कोने,

जहां न भय रहता हो कुछ भी व्यथित होने!

उकेर लो शाश्वत शब्दों से दास्तां,

चलता रहे मौज व मेहनत का कारवां!

नींद के पूर्व जब शेष हो कुछ क्षण,

आत्मनिरीक्षण से मुक्त हो सारा ऋण!

याद करो बचपन के वो रंगीन खिलौने,

जिज्ञासा के अलौकिक बीज लगो बोने!

जब चैतन्य जागृत होता जानकर सहज सत्य,

रूह मुक्त होकर करती निरंतर निर्मल नृत्य!

फिर हौले से वहम सारा मोम सरीखा पिघले,

भाव सहेजे होंठ ना रहते ख़ामोशी से गुपचुप सिले!

सामंजस्य से विलुप्त हो उठते सभी शिकवे-गिले,

राहत क्षमाशीलता के नैतिक गुण से ही तो मिले!




- यति



:)





More love,

&

More light!



^_^