बचपन के कुछ फंडे,
वो फुर्सत वाले सभी संडे,
दिमाग थे सबके ठंडे!
गृहकार्य की परख होती थी हर मंडे,
सबका भारी होता था बस्ता,
टिफिन में लाता था कोई कभी कुछ खस्ता!
किसी ने थोड़ी चॉकलेट खाई आहिस्ता,
क्लास में बात चली कैसे फ्रूट केक हुआ चंद सस्ता!
सबका अपना अनूठा सा था स्वाद,
किसी को मीठा चाहिए पहले किसी को बाद!
वो सारी बातें आती जब भी याद,
लुप्त हो जाती जीवन की समस्त फ़रियाद!
नुस्खे होते थे शिक्षक गणों के ख्यात,
अनुशासन के प्रखर परिणाम जग में विख्यात!
अब उम्र हो चली कुछ वर्ष और बढ़ी,
समझ न आता कैसे भागी बचपने की घड़ी!
अब सबको अपने-अपने काम की काफी पड़ी,
दिलों में दूरी से बेचैन करने को तन्हाई खड़ी!
जैसे पतझड़ में चिनार के पत्तों से टहनियां झड़ी,
जैसे तापमान में हो गिरावट और ठंड हो बेहद कड़ी!
यादों की तख्ती में कुछ अक्षर लिखते हम रोज़,
कुछ मिटते कुछ की हो जाती अनपेक्षित खोज।
- यति
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