पसंद पर पाबंद कैसा?

ना विवश होकर हो किसी के लिए आतुर,

चतुर को ये विकार ना विकास में बनने दे बहादुर,

जानती हूं सृजन के लिए मन होता हैं आतुर,

प्रशंसा के पीछे किन्तु कलाकार ना कर सके परिचालन,

शिलालेख जो इतिहास में सहेजें,

प्रियदर्शी बन समझ को ताकि तू स्वीकारें,

द्विपक्षीय ना रख तू खुद को भ्रम के आड़े,

दृष्टा की सरल सूक्ष्म प्रेम छाया तुझको निखारे,

माया मृगतृष्णा सा मात्र जाल बिछाकर,

ना विवश करें तेरे विवेक का संचालन,

अब स्नेह भी तू आपार पाकर,

विस्तृत में चुनाव का उपयोग लगाकर,

साधारण के प्रति प्रगाढ़ होती अभिलाषा को त्यागकर,

समझ गया तू! पसंद पर क्या फायदा पाबंद लगाकर?

सृजन की शक्ति में कल्पना से ही असल निवारण।




- यति