
विकसित परिवेश को कर,
सौहार्द का न्यौता हुआ प्रस्तुत,
तबस्सुम में छिपी भरोसे की रुत,
हो सकती अंधकार की सत्ता भी पस्त,
स्वावलंबन से हुई बेचैनी की शिकस्त,
सर्व की जागृति से सारा समा भी हुआ मस्त,
न पनपेगी क्रूर पश्चिमी सभ्यता जो नग्न,
होकर कला की खोज में मग्न,
पद्म का मंजुल बागीचा प्राप्त,
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