विकसित परिवेश को कर,
सौहार्द का न्यौता हुआ प्रस्तुत,
तबस्सुम में छिपी भरोसे की रुत,
हो सकती अंधकार की सत्ता भी पस्त,
स्वावलंबन से हुई बेचैनी की शिकस्त,
सर्व की जागृति से सारा समा भी हुआ मस्त,
न पनपेगी क्रूर पश्चिमी सभ्यता जो नग्न,
होकर कला की खोज में मग्न,
पद्म का मंजुल बागीचा प्राप्त,
सारी सच्चाई उसी में व्याप्त,
आशा के बीज का सही दिशा में रोपण,
खिला उजाले के रूप में शक्तिशाली हर कण,
निर्देशों की ज़रूरत अब इंसान को कहां?
खोज कर तहज़ीब में मिलेगा अदब और ऐहतराम,
न आड़े आयेगा अंधविश्वास रूपी विराम,
जिज्ञासा के टुकड़ों को मिल जाएगा आराम।
- यति


