वक़्त का तकाज़ा हैं?
रात्रि हो चुकी ,
सोना नहीं हैं?
पाक सी आंखो में आज निन्र्दा क्यूं नहीं हैं?
दरअसल,
पाकीज़ा पलको को झुकने का तो हैं इंतजार,
किन्तु प्रेमयुक्त जवाबों की मुझे प्यारी सी दरकार,
पूछने हैं अनगिनत ख्वाबों से उमड़े सवाल,
जानना हैं क्या उनके लिए मैं भी हूं खास,
हैं पाकीज़ा ये आस,
अब तो सुकून भी हैं दिल के पास,
नहीं हैं तकलीफों के बहाने पचास,
सुंदर हो संग संग निवास,
आपस में मिलकर दुनिया की खबरों पर आलाप,
आखिर ना जाने कैसा होगा हमारा मिलाप?
मिलेंगे जब और होंगे नैन उनसे जब चार,
ना लफ़्ज़ों पर लग सकेगा ज़रा भी विराम,
अंकुरित होने दूं ना इस कली को नई दोस्ती के नाम,
सफल हों एक दूजे के लिए ये दोनों प्राणी मिलनसार।
- यति


