मैं ना समझती थी ज़िद के आड़े कुछ,
ना जानती थी अभिलाषा बुझाना तुच्छ!
पापा फिर तरकीब निकालते,
बेतरतीब ज़िद को मस्ती में सहलाते!
अनुभवों से हमेशा भरी रहती उनकी जेब,
स्वतः सिमट जाता सुनके उनको ज़िद का फरेब!
फिर रम जाती थी मैं उन रंगो को भरने में,
दीवारों पर और कुछ पापा के मेकअप में!
भरती थी मनचाहे तरह-तरह के रंग,
अबोध मन में उमड़ी रहती थी तरंग!
लेकर सदृश अनूठा सपनों का पिटारा,
पापा के लिए मैं जगमग सा एक सितारा!
दिल सच्चाई पर से ना ज़रा भी रूठे,
इसलिए पापा ना करते वादे मुझसे झूठे!
गुरुकुल सरीखा मेरे पापा का आलय,
श्रेय से सना उनका भीतरी हिमालय,
पापा कहते "लय न टूटे, विपत्ति होगी सब्र से विलय,"
सुंदर यादों की सुखद अनुभूति ना होती कभी प्रलय!
वात्सल्य संग होती विनोदी स्वभाव की विजय,
भोले की भक्ति में लीन पापा कहते शिव शंभू की जय!
- यति


