वो छोटी सी ज़्यादा लंबी वाली छुट्टी,
होती थी नन्ही बातों पर चुप्पी और कट्टी!
घुमाते पापा कंधो पर लेकर मुझे बाज़ार,
सिक्कों से गुल्लक में जोड़े थे रुपए मैंने हज़ार!
मेरी किताबों का पापा रखते थे विशेष ख्याल,
पापा मेरी दो चोटी बनाकर सजाते थे मेरे बाल,
बाजू वाली आंटी खींचती थी सब बच्चों के गाल,
खेलकूद कर कपड़े हो जाते थे बेहाल,
गुज़रते देखे सौभाग्य से मिले हुए सुनहरे साल,
रात को सुनकर सोती थी फिर मैं मम्मी से लोरी!
मम्मी बतलाती हुस्न का ताल्लुक नहीं होने से गोरी,
कहानी सुनाती थी देने को मुझे गलतियों पर सबक,
पापा को बनाकर देती थी अदरक वाली चाय कड़क!
मुझे सिखलाती थी गुणकारी हैं कौनसा भोजन,
ताजुब होता कैसे करती थी वो हर विषय का नियोजन!
अपनों के लिए त्याग था उन्हें सहज मंजूर,
एक पल नहीं गवारा था मुझे उनसे कभी दूर,
वो साड़ी पहन अपने नूर संग लगती थी हूर,
रोज़ श्रृंगार में लगाती थी सुर्ख लाल सिंदूर!
समाज सेवा को माना उन्होंने अपना धर्म,
मुझे सहज प्रेरणा देते उनके समस्त कर्म,
उनके हृदय का नर्म किस्सा गूंजे कानों में बनकर हर्फ़,
अदृश्य होकर भी आज मानो करती पूरा अपना फ़र्ज़!
- यति


