दिव्य दार्शनिक की भांति,

विचारों को मिल रही हैं ख्याति!

प्रेम जगमगाएं यूं जैसे नभ में नक्षत्र स्वाति,

तीव्र हैं प्रेम से प्रगति को बढ़ती मनुष्य की गति,

मानो ऊर्जा को दिशा हुई प्राप्त,

निखर रहा मेरे भीतर जो हैं व्याप्त,

उत्थान तथा उद्धार हेतु सहज लम्हे हैं पर्याप्त,

अनंत से शुरू ये किस्सा क्या कभी होगा समाप्त?

युगों से चला आ रहा हैं भावों का ये बवंडर,

कभी बहाव इतना जैसे गहन समुंदर,

साहस रख मनुष्य समा सकता कितना कुछ अंदर?

प्रेम को पुख्ता करता वर्तमान होता अत्यंत सुंदर!

किन्तु जग में प्रचलित हैं कुछ प्रथाएं सरेआम,

प्रेम तृप्त करता या तमाम हैं इसके आयाम?

निःशब्द भी बयाँ हो जाएं इतना सशक्त हैं प्रेम का पैगाम,

सफल हैं प्रेम से समर्पित लोक हितैषी हर सुबह शाम।



- यति