नभ के पार से मानो रौशनी आई,

अरुण के उदय का संकेत लाई,

आनंदमय प्रतीत होती सवेरे की पुरवाई,

गगन ने कुछ बूंदें प्रकृति पर यूं बरसाई,

मोतियों सी सुंदर बूंद दूब पर उभर कर आई,

फूलों को जल पान करके मानो चुस्ती आई,

पत्तियों की भी मानो हुई हो शुद्धि,

वाणी में माधुर्य आएं यूं मेरे की शीतल हो जाए विशुद्धि।



- यति