मुनासिब हैं व्यष्टी का खुदको सहेजना,

कल तक उन पर भी था ज़िम्मेदारियों का गुरुत्व,

सृष्टि का समर्पण देखें तो बात उलट,

क्या सफल सिद्ध होना वाजिब दौलत के संग्रह से?

अब क्या करें गलतफहमी सरीखे इस दंगल ग्रह में!

हुज़ूर यहां मुनासिब हैं बंद घड़ी का पहनना,

बंद हो जाए सांसें तो भी सत्ता में अरज कहां ?

थोड़ा तकलीफ में तकल्लुफ बरतना मुनासिब,

यहां ज़िद पर भारी ना हो सकी हैं शराफत,

पर आपको ये मुनासिब की तैयार होकर वक़्त के साथ गुनगुनाते हुए,

कभी मन को मुनासिब लगे तो उसे इतना ही समझाइए,

मुनासिब हैं व्यष्टी का खुदको सहेजना,

हो जाइए तैयार तो आपको भी सिद्घ होने का मिल जाएगा मौक़ा!

और पार हो जाएगी आपकी भवसागर से नौका!


- यति