इक रूठे से चेहरे पर मुस्कुराहट,

उसके संग मीठी मीठी फुसफुसाहट,

उसको करनी ऐसी प्रेम पूर्ण गुदगुदाहट!

लाना हैं धूप से मिलने वाली गुनगुनाहट,

पतझड़ की खुरदुराहट,

सर्द हवाओं की जैसे आहट,

ऐसा करना हैं महज़ मज़ाक!

एवज में जिससे न रूठे उसके ख्वाब़,

यूं तो हमारे भीतर भी भावों का उमड़ा सैलाब,

पर चेहरे में झांका तो नज़रों में उसके थमा हुआ तालाब,

वो अल्फाजों की गुलामी करने से बचते लब,

अधिक चिंतन से हों रहे छोटे प्रातः और शब,

क्या ऐसा होता हैं कोई स्वस्थ्य मज़ाक?

जिससे ना हों आंखें उसकी कभी नम,

जो वो खुद भूलें अपने सारे गम,

भलें वो कर लें नन्हें सितम,

किन्तु फांसले उसके खुदसे हो सकें कम,

क़रीब आकार हिदायत हो जाएं "मैं" से हम!


- यति