मुख पर झलकती दुआ और दया,

भला गुज़रा लम्हा कैसे हो बयां?

कभी कलम की नज़ाकत,

कभी चुस्त करिश्में की शरारत!

छोटी सी पोटली में बंद ख़त,

ना छूटे लिखते रहने की ये लत!

जीवन देह में प्राण होने की बदौलत,

जैसे सरल उपस्तिथि घनिष्ठता की हो दौलत!

लम्हों को सहेजने में चाहे हों अनेक मत,

सदा मुमकिन लम्हों की तिज़ोरी में बरकत!

गुज़रे लम्हें तो जैसे..

कभी मरहम बन जाएं!

कभी उम्मीद जगाएं!

कभी तनिक सहमा!

कभी जैसे निर्मल नूरी नग़मा!

ज़िक्र में फ़िरदौस तथा फ़रिश्ते,

बयां करते अत्यंत रूहानी रिश्ते!

हमेशा लम्हों के कहां होते बोल?

जब सुकून में मापे इन लम्हों का मोल,

तो सुनना रूह क्या रही पहली दफा बोल!

सौभाग्य होता मिलते जब रिश्ते निभानेवाले,

लम्हों में रूप संग रूह को सराहनेवाले।




- यति