ये जो अनूठा लगाव हैं,

भरता मानो हर घाव हैं!

ऐसा कैसा ये रक्तस्राव हैं?

जो ज़ख्म था अब स्थिर भाव हैं,

अब बुझदिल क्यूं रहूं,

अकेले अत्यधिक सोच से समाधान कैसे रचूं?

लगता, तुम्हारे संग होने का चाव हैं!

ये रिश्ता संतुलन बनाए रखने की ही तो नाव हैं!

जैसा भी भीषण आभाव हैं,

वो केवल चंद क्षणों का बहाव हैं,

तुम सरल सहजता से आए हो,

गहन सार्थकता भी संग लाए हो,

तुम्हारी रूह में समा सकूं,

तुम्हारा आइना बन विकार सारे मिटा सकूं,

द्वेष का भाव समाज में जो फिर मुझे कभी दिखे,

हमारे रिश्ते का अनूठा लगाव यादों में भी सराह सकूं।


- यति