
क्या तुम्हें उसकी कमी खली?
क्या तुम्हारे ज़हन में भी बात ज़रा देर को ठहरी?
की कहो तुमने भी सांस भरी थोड़ी गहरी?
क्या समझ आया किस बात पर वो सहमी?
क्यूं चाहेगा समाज उसकी मन की झंकार सुन भी वो रहे बहरी?
क्या ख़लिश की नुमाइंदगी के बन रहे तुम पहरी?
क्या वफ़ात के बा
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