क्या तुम्हें उसकी कमी खली?

क्या तुम्हारे ज़हन में भी बात ज़रा देर को ठहरी?

की कहो तुमने भी सांस भरी थोड़ी गहरी?

क्या समझ आया किस बात पर वो सहमी?

क्यूं चाहेगा समाज उसकी मन की झंकार सुन भी वो रहे बहरी?

क्या ख़लिश की नुमाइंदगी के बन रहे तुम पहरी?

क्या वफ़ात के बाद करेगी वो अपनी इच्छा की पूर्ति?

क्या अनावश्यक नहीं हैं समाज की सामूहिक मदहोशी?

क्या तुम भी मूक दर्शक बने रहने की ना छोड़ोगे प्रवत्ति?

क्या यूंही चलती रहेगी निवृत्ति?

क्या तुम जन्म दोगे एक ऐसा दाना जो न बन सकेगा मज़बूत वनस्पति?



- यति