सुना हैं, मौहल्ले में चर्चा हुई,

बौखलाई जनता ने सब्र से बनी इमारत गिराई,

वो तो मानो खड़ी हुई थी मज़दूरों के जिस्म की करके अगुवाई,

बात थी की किसी फलां नेता ने नहीं करी थी वादे कि भरपाई,

सोच में छोटी मां से सवाल कर आयी,

पूछी जनता की सेवा कौन करता हैं आई?

अपनी सहेली से खुद मिलकर गुपचुप एक किस्सा सुन लाई,

शायद किसी ने बरसों से टूटी पाइप लाइन खुद खर्च करके जुड़वाई,

उसने जानना चाहा जनता की कैसे वो कर सकती भलाई?

विचार विमर्श से अध्यापक ने उसकी सोच निर्मित करवाई,

थोड़ी बड़ी हुई तो समझ आया सहयोग और सहारे में अंतर है भाई!

सरल सहयोग करते वक़्त कभी स्वयं की इच्छा नहीं तिलमिलाई,

यही तो भेंट स्वरूप दे सकते समाज को स्वादिष्ट मिठाई,

समर्पण नन्हे बच्चे का देख वो मुस्कुराई,

हंसती हैं बचपन को याद कर, पहाड़ में उसे कभी नहीं मिली राई,

जश्न चल रहा था गली के क्रिकेट में,

विकेट कीपर को टीम दे रही थी बधाई,

"क्रेडिट" पाने को करते हो के सवाल से माहौल में मस्ती की घुली पुरवाई,

अपने सहयोग से हम खुद बनते सहभागी,

खुदको श्रेष्ठ साबित करने की कामना हर खिलाड़ी ने त्यागी,

तभी अगले मैच में उत्सुकता संग एकता भी जागी!


:)


- यति