कभी शोध में रहती वो गहन,
कभी नम कर लेती वो नयन,
ओजस जिज्ञासा देखो लिए,
प्रज्वलित अनेक भीतर उसके दिए!
आहिस्ता प्रक्रिया हर करके सहन,
बदलाव को लाना ठानी अपने ज़हन!
सच को अपनाकर लाना उसे अमन,
नकारती सबूत से सभी फिज़ूल कथन!
कभी जुगनू जैसे जगमगाती,
कभी तारों सा टिमटिमाती,
कभी कुमुद जैसी वो खिलती,
कभी मुरझाने पर डाल से गिरती,
मुरझाने पश्चात माटी संग ही मिलनी,
इसलिए मुखड़े से ज़्यादा उसकी सीरत सलोनी!
कवियित्री की कल्पना हर रूह को सराहती,
वो प्रकृति को घर सा शनैः शनैः दुलारती,
धैर्य रखती प्रतिकूल हो चाहे कभी समय,
वो नहीं होने देती बेशकीमती ऊर्जा क्षय!
प्रकृति प्रेमी जैसे हर बदलाव को सराहते,
हर रूप में छिपे भेद को बखूबी पहचानते!
फिर टहनियों में देखते कोपल कभी उभरता!
बिछड़ते पत्तों संग पतझड़ में वो बिखरता
मिलता छावनी में वो बिखरे पत्तों वाली गली,
बेहतरी की आशा लगती प्रयासों संग कितनी भली!
- यती


