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कभी शोध में रहती वो गहन,

कभी नम कर लेती वो नयन,

ओजस जिज्ञासा देखो लिए,

प्रज्वलित अनेक भीतर उसके दिए!

आहिस्ता प्रक्रिया हर करके सहन,

बदलाव को लाना ठानी अपने ज़हन!

सच को अपनाकर लाना उसे अमन,

नकारती सबूत से सभी फिज़ूल कथन!

कभी जुगनू जैसे जगमगाती,

कभी तारों सा टिमटिमाती,

कभी कुमुद जैसी वो खिलती,

कभी मुरझाने पर डाल से गिरती,

मुरझाने पश्चात माटी संग ही मिलनी,

इसलिए मुखड़े से ज़्यादा उसकी सीरत सलोनी!

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