जहां मंज़िल से सुहाना हो सफर,

सहसा सहज स्वतंत्र हमसफ़र!

सद़ाकत होती सुबोध,

वहम का मिटता बोध,

आता ना हो बात-बात पर क्रोध!

न लगता हो प्रगति पर अवरोध,

नज़ाकत से मिटता भ्रम,

जुड़ता नई यादों का क्रम,

अविरल शक्ति का प्रवाह,

हुनर का होता सही निर्वाह!

वक़्त भी बनता गवाह,

खतों में दर्ज़ होती चाह,

पल गुज़रते समक्ष दिखती नई राह,

नज़रों से व्यक्त होती परवाह!




- यति




♥️