कशिश समझे खामोशी की?

खुमार तो उतरे फिर भी प्रेम सदा गहराए,

दुनिया की हो चाहे जो भी फिर राय,

एक बार तुम्हें समाज की क्रूरता पर जब होने लगे हाय,

फिर कशिश समझोगे मेरी खामोशी की,

तुम मेरी आंखों को पढ़ने में भी रखते दिलचस्पी,

क्या कभी जिस्म के परे भी प्रेम की अभिलाषा तरसी?

फिर महीने गुज़रे आने को हैं मां की बरसी,

क्या उपहार में दे सकती उनके प्रयासों के समक्ष अर्ज़ी,

संरक्षित हो साहित्य की कला यही थी उनकी मर्ज़ी,

बदलाव होगा , बन सकूं मैं भी उस में सहभागी,

कर संकू सच्चे उत्साह से प्रोत्साहित हर प्रतिभागी,

कशिश समझे खामोशी की?


- यति