कुदरत की कृपालता हैं करिश्माई,

आंखों से न ओझिल होती मां की परछाई,

थोड़ा हकीकत में दुलार कर सहलाई,

थोड़ा सपनों में वो मुझे समझाई,

चैन को छीनने वाली समक्ष खड़ी हो चाहे कोई कठिनाई,

मां किन्तु ममता अपनी इस क़दर मुझ पर लुटाई,

तभी ख़ामोशी में जूझते लोगों की चीख समझ आई!

और एहसासों का सम्मान करना मैं सीख पाई।

कोई टूटे दिल को जोड़ेगा नहीं,

जो भीतर से टूटा हैं अक्सर रूठेगा वही,

कुछ पल का क्षणिक जीवन हैं,

मौन से भी प्राप्त मार्मिक मरहम हैं,

रीत के विपरीत थोड़ी कुदरत किसी शरीर को सहलाता हैं,

भ्रम फिर क्यूं व्यक्ति बेवजह के पालता हैं?

उखड़ गई जो सांसे,

वो मोह के सारे झांसे,

फिर भी एहसास हैं उनके सारे ताज़े,

जनाज़ा उनका चला गया,

गम का अंधेरा छंट गया,

दर्द भी अपनों संग बंट गया,

स्याही संग लिखें सुनहरे खतों को भी आती लगता हया,

मां की हिम्मत मन शनै: शनै: टटोलता,

कुछ खट्टी मीठी यादों के पन्ने बार बार खोलता,

ख़ुशी के पलों में आज भी मां को मन मेरा पुकारता,

पलों से बने जीवन की उम्र मन वर्षों में न जाने क्यूं मापता?



- यति