सड़क में शोर हैं,
हॉर्न बज रहे हैं,
मैं गाड़ी के भीतर,
उत्सुकता से बड़ रहा हीटर,
आज का दिन कैसा होगा?
आज का बाज़ार ठंडा तो ना होगा!
मिलने हैं ऑफिस में कुछ अनोखे मित्र,
फतेह करना आंकड़ों का लेखाचित्र,
होंगी बातें तरह तरह की विचित्र!
बिकेंगे किस्म किस्म के महंगे इत्र...
रुकी गाड़ी सिग्नल पर,
कंधे पर रखा था उसके बच्चे ने सिर,
डर लग रहा उसके हाथ से न जाए चूड़ियों का डिब्बा गिर,
मांग रही कुछ विशेष नहीं,
क्या दिल बहलाने हेतु खरीदूं मंशा सही ?
उसको मदद की आवश्यकता तो नहीं कहीं!
उसको शायद सुनानी कोई घटना अनकही,
उसके सीने में दर्द की दास्तां छिपी,
मोगरे के गजरे लिए आज वो फिर दिखी,
चेहरे पे शिकन,
शरीर में क्लांति,
जानती मैं भी भली भांति,
बोहों में साफ उभरता उसके दबाव,
आज फिर वो नंगे पांव,
दिन गुज़रे ,
हफ्ते बीते,
महीने खत्म होने में कुछ दिन शेष,
आज भी मेरे मन को महकाए उसके गजरे के लेश,
याद आया उस वक़्त उसके बिखरे भी थे केश,
कहीं चूंक तो नहीं रहा समाज देने में सही संदेश,
जागृति के बाद व्यापार के प्रसार में लीन हो रहा देश,
भूलें ना आज भी गरीबी से भूूक मचा रही पेट भरने को कलेश,
कलेजा जलता हैं,
जी तो शायद उसका भी मचलता हैं,
उम्र खेलने की उसके बच्चे की!
तो किस बुनियाद पर वो वादे बुने,
उसकी दशा अगर हम न बदल सके,
अगर वो उम्र का कुछ हिस्सा अफसाद में घिरी?
तो किस काम की ताकत के हाथो में हथकड़ी?
कोई अवैध संस्था का मुजरिम उसको अगर न पकड़ सकी?
क्या हम पुनः बदलाव की ज़िम्मेदारी लें,
विभिन्न क्रांतियों में,
जुगाड़ से मज़बूरी की दूरी कम करें ?
ताकि विकल्प उसको सही मिलें!
- यति

