हमदर्दी हमेशा हिमायत करें तुम्हारी,

प्रकृति के हम तुम बहुत आभारी,

छूट नहीं सकती बदलाव में हिस्सेदारी,

हकीकत न जाने कैसे इतनी स्वाभिमानी,

सफर अलहदा चुनने में भी अब आसानी,

नाखुश रहने की गिरफ्त में एहसास करें मेरी पहरेदारी,

संग रहने हेतु तुम न निभाते वफादारी,

चुनिंदा अल़्फाज़ो में भी जज़्बात तुम्हारे भारी,

क्या नहीं निकट तुम्हारे मां स्वरूप सशक्त नारी,

कब तक झूठ में घोंलोगे मिश्री सा मीठा पानी,

नहीं करता वक्त तख़्त पलटने में नादानी,

इतनी बात तो रह सह के रूह ने जानी,

अब वक़्त को ये बात स्वत: सुलझानी,

मुझे नहीं मूर्खता से कोई बात सुलगानी,

क्षमा , सपनों को जीने में न हो सकेगी मुझसे आनाकानी,

मैंने माता पिता की खामोशी पहचानी,

मेरे भले के लिए खुदको भी पहुंचा देते हानि,

उनके परिश्रम तथा त्याग से नहीं अनजानी,

उनके अलावा और किसी की न मैंने मानी,

मुझे पसंद मेरी सरल सी खुद पर निगरानी।


- यति