हैवान से हुई हूं आज फिर हैरान!

निर्भया का घर आज भी वीरान!

मौत के घाट डाल भर दिए शमशान!

मौका इनको मिलता जब भी रास्ता सुनसान!

दर्द लेती गर्भ में मां कितना उससे ये अनजान!

हैवान से हुई हूं आज फिर हैरान!

मादकता के विष से ज़हरीला हो रहा समाज!

बयानबाज़ी से ही तो चलता हैवान का पूरा कामकाज!

स्तन को नोंचने की सोचने पर ना आती इनको लाज!

वहशी की बदहवासी से कितना मन बौखलाया आज!

अश्लीलता को बर्दाश्त करने में नहीं वहशी का इलाज!

हैवान से हुई हूं आज फिर हैरान!!

उजाड़ते ये नींद बेटियों की भरते अपनी जेब,

सत्ता के नाम पर चल रहा क्रूरता का कैसा ये फ़रेब!

बलात्कारी के डर से सिमटता देखो बेटियों का नसीब!

घरबार चाहता बेटियों को रखना अपने ही करीब!

अज्ञानता को शिष्टता से सीखनी होगी अब तहज़ीब!

हैवान से हुई हूं आज फिर हैरान।



- यति