घर


क्यूंकि इन चार दीवारों ने खुदसे रूबरू जो करवाया हैं,

हाल बेहाल हो तब भी खुशियों कि नन्ही झोली को भरना सिखाया हैं।


आई की झटक कर इतराती हुई खुसफुसाहट,

पापा कि गोद में सहलाती हुई मेरी नन्ही सी गर्दन...


देखो,

आज इतनी बड़ी बिटिया मैं हो चली,

कल घर कि लाडली बहानो से सपनों को छुपाती चली जाती है...


घर की याद तो मुझे कल भी सतानी हैं...

आओ ऐसा घर सजाएं,

प्यारी सी इक बगिया बनाएं...


जहां शोर भी हो,

सुकून भी हो।


तन्हाई से लिपटे जिस्मो में भी अंगड़ाई का आलम हो,

आओ घर को फिर स्वर्ग बनाएं...


एक छोटा सा सपना फिर से सजाएं।✨


- यति


:)


शुक्रिया