" दिमाग में द्वंद!

विभ्रान्ति से प्रतिद्वंद!

प्रगति हो रही ज़रा मंद,

करों मनोरंजन का चलचित्र बंद!

वक़्त संग की गुस्ताखी माफ़ करो सब,

लिखोगे भव्य सा छंद फिर कब ? "


* कुछ वक़्त अंतरावलोकन के पश्चात *


प्रस्तुत हैं आप सभी के समक्ष :-


देहाती


मिजाज़ झलकाए ऐसी उसकी पोशाक!

रूह उसकी बड़ी ही पाक,

उसको करते देख आराम,

पवन भी उत्सुक होकर सजाएं दृश्य अभिराम,

गुमनाम होते पत्तों पर नज़र टिकाए हैं,

केश अपने खोल तनिक लहराएं हैं,

घड़ी घड़ी पूंछे हाल सबका,

जाने उसको गांवों का हर तबका!

घर पहुंच मां को सब बतलाती हैं,

फिर चुनकर किस्सों को स्याही संग इठलाती हैं,

देख पीली सरसों,

लगता समाया सुकून इनमें बरसों,

गावों में भादो का आगमन परसो,

वर्षा ऋतु से कहती वो अभी से बरसों!

प्रदूषण से किन्तु सफ़ाई अभिशप्त,

सरपंच के समक्ष गवाही देने वाला भी गुप्त,

लेकिन प्रयास नहीं होंगे बदलाव के लुप्त,

नहीं गांव में जीवनशैली सुस्त,

जानते सब वर्षा प्रतीक्षित,

जागरूक हुआ हर नौजवान प्रशिक्षित,

स्कूल जाने की सड़क अब पक्की हैं,

कल्पना की शक्ति से संसार में तरक्की हैं,

बच्चों के स्वस्थ्य नज़रिए को,

आत्मविश्वास रूपी झरोखे को,

भेंट में दें संसाधन जो हो सुलभ,

जो उज्ज्वल करें उनका बालपन दुर्लभ,

मिले सहज स्वीकार्य यौवन,

खोलें रचना का रमणीय सा उपवन,

सोचो कुछ ऐसे सुझाव!

भर दें जो हो बूढ़ी दादी के सूनेपन के घाव,

उनको नहीं स्क्रीन टच वाले फोन का चाव!

उनके संग विकसित करों सौहार्द का भाव,

थोड़ा सा नवीन करो अपना बर्ताव,

गांव में पांव जमाओ कभी,

सहसा सहज ज्ञान सुहाएगा तभी।



- यति