आप कई विधाओं के धनी हैं।

बेशक!

महारत हासिल करना हुनरमंद शख्सियत की बेजोड़ कला हैं,

कई प्रमाणित पद्धतियों के अनुसार भी क्षणिक कुंठा मानो अपने लिए ऐसा कुआं खोदने समान हैं जिसकी गहराई आप तत्काल नहीं माप सकते,

उसमें कूदना ऊर्जा क्षय करना तो साबित होता ही हैं किन्तु साथ ही आपको अनावश्यक रूप से व्यस्त कर आपके चित्त को निरर्थक दिशा में मोड़ देता हैं।


क्या आपने कभी अनुभव किया हैं ,

आपका विवेक आपको वर्तमान में स्थापित करना चाह रहा हो परन्तु आपका दिमाग आगाह होने के बावजूद कुछ क्षणों के लिए विचलित हो रहा हैं?


अगर हां,

तो मेरे साथ घटित एक नव वाक़या पर अपनी सोच प्रस्तुत करें,



मेरे कार्यालय का काम सही चल रहा था,

उसकी एवज में मुझे पर्याप्त तनख़ाह के साथ साधन उपलब्धत हैं ताकि कार्य में व्याधि न हो।


अचानक, कार्यालय से कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ गायब मालूम हुए, मैं थोड़ा शांत बने रहने की नसीहत देते हुए दस्तावेज़ो की खोज में लग गई,

कुछ ही पलों में शंका यकीन में बदल गई ,

अफवाह उड़ी की वो ज़रूरी दस्तावेज़ चोरी हुए हैं।

यहां मेरा यकीन ये नहीं था की दस्तावेज़ चोरी का आरोप जिस पर मड़ा जा रहा हैं वहीं असल चोर हैं।

वो सिर्फ अफ़वाह का बुनियादी पहलू हैं, पर हकीकत तर्कहीन नहीं पेश की जा सकती।


हकीकत थी : दस्तावेज़ गायब थे।

तर्क के साथ प्रस्तुतिकरण : फलां व्यक्ति ने चुराए।


अब मेरे जवाबदेह होने पर भी प्रश्नचिन्ह उठ रहे थे,

मेरे रहते दस्तावेज़ गायब कैसे?


उपरोक्त किस्से में मेरा कुछ मिनटों तक सहजता से बर्ताव करना मेरे साथियों का संबल बढ़ा रहा था, जो जानते थे वो साथ खड़े थे, जो नहीं जानते थे वो खामोश थे,


धीरे धीरे सब आ आ कर अलग अलग कहानियां प्रस्तुत कर रहे थे,

फलां की गलती, फलां पर इल्ज़ाम लगाओ,

" तुम अपने हाथ उठाओ"

" तुम उच्च स्तर तक बात पहुंचाओ"

आदि आदि।


किन्तु बिना किसी सबूत नाराज़गी व्यक्त करने से बेहतर सुझाव था शांत रह कर घटना का लिखित प्रमाण उच्च स्तर पर पहुंचाना शीघ्र ।


हुआ भी ऐसा ही ,

लिखित तौर पर गायब हुए दस्तावेज़ो की सूची उच्च स्तर तक जा पहुंची,

घटना का विश्लेषण हुआ,

कुछ ही मिनटों में दस्तावेज़ पास वाली अलमारी से प्राप्त हो गए,

किन्तु फलां व्यक्ति जिस पर आरोप लगे वो काफी टूटा हुआ महसूस करने लगा,

मानो उस पर ऐसी बात के लिए आरोप लगे जिसका उससे ताल्लुकात तो था पर उसकी मंशा में खोट नहीं था,

आगे भी फलां व्यक्ति को कार्यालय में काम करना हैं पर इस वाक़या पर वो अपनी टिप्पणी पेश करते तिलमिला गया,


ना उसका कसूर कोई पर उसकी गलती न होते हुए भी उसे कसूरवार की दृष्टि से देखा जाने लगा,

क्यूंकि दस्तावेज़ उसके हाथों ही अलमारी में रखे गए थे,

उसका गुस्सा और क्षणिक कुंठा उसको आरोपी करार रही थीं ।

बिना वजह भी आपको कुंठा असहज कर देती हैं।


उपाय आपके भीतर ही हैं,

बशर्ते आप संकट में अपना स्वरूप ना छोड़ें,

धैर्य आपकी जीत हैं,

जीवन की कला को माहिर करने में शांत चित्त होने की ये रीत आपके मार्ग के व्यवधान को विलय कर देगी,

और प्रलय में भी प्रणय की ये सोच आपको पराजय में प्रसन्न रखेगी।:)


तो मुस्कुराइए ✨


आपकी बत्तीसी चमकदार हैं!


यूंही चमचमाते रहिए,

टिमटिमाते तारों में अपना ध्रुव तारा ( उद्देश्य ) खुदको याद दिलाते रहिए!


आपकी,

-यति


प्रेम के साथ,

सादर प्रणाम।



शुक्रिया !