कुछ शत्रु अभी कायम हैं,
वो जो समाज के लिए लानत हैं,
कुछ धोखा खाया मैंने,
कुछ शायद कम परखा मैंने?
किन्तु दुविधा में डाल दहशत हुई उसके जिगर?
फिक्र वो करता इंसानियत की अगर,
तो ढकेल मुझे मौत के कुएं में,
मज़ा ना आता उसे हैवानियत के जूए में!
आज रूह मेरी कांपी हैं,
दिल की धड़कन फिर यकीन को आलापी हैं,
मुझे हैं नाखुश होने की वजह पर संदेह!
हूं हतप्रभ! सिमटा मानो ख़ुशी का घेरा,
समाप्त हो उसके घिनौने अपराधों का डेरा,
प्राप्त हो न्याय का प्रभावी सवेरा,
सुने सत्ताधारी! अस्तित्व हैं सतर्क नागरिक के नाते मेरा!
खत्म हो दहशत का ये घना अंधेरा।।
- यति
"The man who has a conscience suffers whilst acknowledging his sin. That is his punishment."

