मिला तुम्हें कभी कोई ऐसा शख्स?

ज़रूरी हो जिसका जीवन पर अक्स,

खट्टे भले लगे उसके कुछ लफ्ज़,

जुड़ती हो उससे तुम्हारी नब्ज़,

कटाक्ष करना भी माने वो फ़र्ज़,

उसका श्रोता बनना हो जैसे मर्ज़!

कभी शरारती हो उसका ढ़ंग,

उसके व्यक्तित्व के अनोखे रंग,

अर्पण उसे समय करके देखो!

खुदका दर्पण बनते फिर देखो,

स्वस्थ्य समर्पण करके फिर देखो,

स्पष्टता फिर विचारों में खूब देखो!

कुछ खामी हो उसे तुम्हारी बर्दाश्त,

सरल लगे उसकी तुम्हें हर दर्खास्त!

ख्वाइशों की भी कभी-कभी बात हो,

मीठी सी मुलाकातों में राहत भी साथ हो!

उपस्थिति में उसकी अपना सा आभास हो,

उपलब्धियों से ना ज़रा भी शेष आसक्ति हो,

विशेष उसकी सरल स्वीकारोक्ति हो,

निर्वाह दोनों की दिव्य सी शुभ शक्ति हो।



- यति





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