आए थे तुम खामोशी लेकर,

बातें मेरी सुनकर मुस्कुराते थे तुम!

सांवली सी सूरत,

सादी सी मुस्कान,

प्रिय लगा तुम्हारा सहायक अंदाज़,

परिचय लिया तुमने मुझे अपना परिवार बनाकर,

माना मैंने सेवा तुम्हें सर्वोपरि,

देख तुम्हारी नादानी ,

हुई चेष्टा , लगा खेलेंगे लंबी पारी,

भावभंगिमा से लगा तुम ना जज़्बातो के व्यापारी,

तुम तो सटीक लगे थे,

कफ़स को लगा तोड़ दोगे,

कसर सारी छोड़ दोगे,

सफर को शायद कोई नया मोड़ दोगे,

भागती हुई दुनिया में,

रुककर थोड़ा सरलता पर ज़ोर दोगे,

कठिनाई में साथ से संबल दोगे ,

बीती हुई दास्तां से शायद कुछ सबक लोगे,

मुझे चाहने की सच्ची बात

लगा मुझे उस पर अमल करोगे,


मौसम कितना सुहाना था,

हर बात पर मेरे लबों पर

नए गीत का बहाना था,

गुनगुनाते थे तुम थोड़ा कम

आवाज़ तो अच्छी थी,

पर शरारती थे तुम

ज़िद्दी होकर भी कैसे भा जाते थे तुम?

किसी फिल्म सी तो कहानी चल रही थी,

.

.


खुदकी खुशी से चले गए तुम,

अब फिर रुख बदल गया,

हवा का नहीं ,

मेरी अनुभूतियों का!

आए थे लेकर ख़्वाब सजाकर,

नाकाबिल वादों की टोली लगाकर,

फिर भी उम्मीद के कुछ ख़्वाब सजाकर,

सोचा मैंने भी तुम्हें देखूं अपना साथी बनाकर,

दिन बीते , बीते कुछ हफ़्ते,

हो गया अब अरसा,

इस दिल को क्यूं दिया कष्ट का तोहफा?

भूल हुई मुझसे जो ना देखा अपना मोल,

आत्मा को तो मेरी तुम तोल रहे थे खुदमें होकर मशगूल,

एक बार भी नहीं झांका मेरे अंदर बसा ममता का हूर,

यकीन नहीं होता तुम दे सकते धोखे,

वादों को ना अगर अल्फ़ाज़ो में पिरोते,

तो आज रोते रोते सुबक ना आता ये सवाल,

अब कैसे झेले दिल ये बेमतलब का बवाल,

पूछती हैं मेरी सहेलियां क्या हुआ तेरे अटूट रिश्ते का,

क्या दूं जवाब टूटे हुए मंज़र का,

भीतर की आवाज़ कैसे नहीं समझ पाई,

आकर अलविदा कहने वाले तुम,

तुमसे तो कभी हासिल थी नज़दीकी की डोर,

जाने दो फिर से हो गई रात्रि से भोर।


- यति